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DMT अभिनंदन स्वामी जिनालय में विधि-विधान से हुआ दुर्लभ ‘कल्पवृक्ष’ का रोपण




​साधु-संतों के पावन सानिध्य में संपन्न हुआ आयोजन, श्रद्धालुओं ने की सुख-समृद्धि की कामना


​धमतरी।शांति कॉलोनी स्थित श्री अभिनंदन स्वामी जिनालय परिसर में शुक्रवार की दोपहर धार्मिक उल्लास व भक्तिमय वातावरण के बीच आस्था के केंद्र दुर्लभ कल्पवृक्ष का पौधारोपण विधि-विधान से संपन्न हुआ। यह मांगलिक कार्य पूज्य साधु-संतों के पावन सानिध्य तथा सुरेश छाजेड़ के कुशल दिशा-निर्देश में पूरा किया गया।

​इस पावन अवसर पर पूज्य साध्वी रत्न श्रीजी आदि ठाणा दो की गरिमामयी विशेष उपस्थिति रही।बताया गया कि ​यह दुर्लभ कल्पवृक्ष विशेष रूप से रांची से राजनांदगांव लाया गया था, जहां से लीलाबाई दुग्गड़ परिवार द्वारा इसे ससम्मान धमतरी लाया गया और जिनालय परिसर में रोपित कराया गया।


मनोकामना पूर्ति का प्रतीक है कल्पवृक्ष

​पौधारोपण के पश्चात आयोजित धर्मसभा में साधु-संतों ने कल्पवृक्ष के आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। बताया कि कल्पवृक्ष केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि मनोकामना पूर्ण करने वाला एक अलौकिक व दुर्लभ वृक्ष है। भारतवर्ष में यह केवल चुनिंदा व गिने-चुने स्थानों पर ही पाया जाता है। जिनालय परिसर में इसका रोपण होना पूरे समाज व क्षेत्र के लिए अत्यंत सौभाग्य एवं गौरव का विषय है।

​इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान श्वेतांबर जैन मूर्ति पूजक संघ के अध्यक्ष विजय गोलछा, संतोष पारख, अशोक राखेचा, धरमजीत दुग्गड़, अनिल दुग्गड़, सुनील, संकेत पारख, किरण देवी, दीपाली दुग्गड़, संजय दुग्गड़, मोहित दुग्गड़ सहित बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने वृक्ष की सुरक्षा व संवर्धन का संकल्प लेते हुए क्षेत्र की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।



कल्पवृक्ष का महत्व

कल्पवृक्ष हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म में हर इच्छा को पूरा करने वाला एक पवित्र और पौराणिक दिव्य वृक्ष है। समुद्र मंथन के दौरान प्रगट हुए चौदह रत्नों में से एक कल्पवृक्ष को माना जाता है, जिसे देवराज इंद्र अपने साथ स्वर्ग ले गए थे। इसे समृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और विकास का प्रतीक माना जाता है।मान्यता है कि इसके नीचे बैठकर जो भी कामना की जाए, वह पूरी होती है।भारत में इसके कुछ ही प्राचीन और ऐतिहासिक पेड़ बचे हैं।







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